तू खुद से ही प्यार कर

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  • शशिकांत ओझा, मेदिनीनगर

तू खुद से ही प्यार कर ,
तू किसके इंतजार में है?

अगर बाहर प्यार दिखें
तो भली इंकार कर।

तू खुद से ही प्यार कर।
ना होगी बिछड़ने के डर।
ना होगी नाराजगी कभी।

हर पल अपना ही साथ होगा।
ना झूठे वादे होंगे।
ना बेबुनियादी उम्मीदे
हो जहां संचाई है
मेरी पहचान वही।

अरे ओ आधे रास्ते में
अटके मुसाफिर।
कभी जिंदगी ऐसी भी देख जिकर

मैं फिर कहता हूं
तू खुद से ही प्यार कर।

यह दुनिया है मतलबी ,
तुम्हारा प्यार नसीब हो उनको यह उनकी नसीब नहीं।

बेहतर होगा तू खुद
के अंदर विचार कर ,

याद है हवाओं के साथ टूटे उन पत्तों का कोई अस्तित्व नहीं।

समुंद्र जिस मोती के तलास में अकाश की ओर बाहें फैलाती है , ओ है उसके भीतर।
उसने कभी झांका ही नहीं अपने अनदर ।

सूर्य भी समुंदर को सुखाने की पूरी कोशिश की परंतु कीमती मोती आज भी है वही ,

तुम जो बिन औरो के अधूरे समझते हो खुद को
शेरों को किसी झुंड में चलते देखा है कभी?

हीरन जिस कस्तूरी के सुगंध के लिए दौड़ती चलती है।
उसी के नवी में है अपार।

जब तुम जन्म लिए धरती पर , पहले जिन हाथों में कदम रखें , वही है सच्चा प्यार।
मां बाप रिश्तेदार है दुनिया में मरूधान।
बाकी दुनिया तो बस है मिराज ।
वो नादान बच्चे अक्सर पहेलियां शिकार पर सुंदर स्वर में गाना है गाते ,
तू भूल गया शिकारी दाने के साथ जाल भी हैं बिछाते,
कछुआ है वह इंसान जो मां पिता को छोड़कर ढूंढता फिरता है सच्चा प्यार।
अर्थात नहीं समझा ईश्वर का दिया उपहार।
बहुत कर लिया तूने दुनिया का फिकर अब खुद की भी करले कदर।
बस बहुत हुई अब तो तुम हो गए बेघर।

अपनी मंजिल की ओर जाता कोई मुसाफिर पूछे अगर तो उसे कह देना। तू खुद से ही प्यार कर।

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