लाक डाउन मजदूर के पांव की बेडी है

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  • जावेद खान वाराणसी

लाक डाउन मजदूर के पांव की बेडी है!

आंखों के आंसू सूख गए पांव के छाले हरे हो उठे…भले राह कितनी भी लंबी है उसे पार करने की हिम्मत है पर चलने पर पाबंदी। घर छोड़ घर के लिए गृहस्ती सिर पर लाद यह निकल पड़े थे, ऐ सोच की मुल्क अपना है एक राज्य से दूसरे, दूसरे से तीसरे होते कभी तो अपना राज्य भी आ ही जाएगा। यह ख्वाब खुली आंखों से देख रहे हजारों मजदूर मजबूर हो अपने ही देश की सीमा बंदी के की घेराबंदी में घिरे बैठे है। किसे सुनाए? कौन सुनेगा? मजबूर मजदूर की कराह, सच भी तो है आह और कराह मजदूर की दो निशानियां है, तो फिर परेशानी क्यों? और किसे हो? जलालत की पाठशाला का अव्वल छात्र ही मजदूरी की मजबूरी को ताउम्र सिर पर ढोता रहता है, बोझ उसका गहना,जलालत उसका ईनाम, हकारत उसका हक, और मौत उसका इंतजार.. जब से मजदूर शब्द उपयोग मे आया है ये सब तब से ही उसके हाथ की लकीर बन तकदीर की तरह चस्पा है। सब बदल गया अगर कुछ नही बदला तो वो है मजदूर का इस्तकबाल, आज भी मजबूर मजदूर अपने ही वतन मे अपने ही घर जाने की ज़िद्द पर कही कोने मे बैठा दिया गया है लाठियों डंडो बूटो की नोक पर कभी लिखा था आज सच लग रहा है, “मजबूर मजदूर मशहूर हो गया, साहेब तेरे राज मे चूर चूर हो गया”।
सूरत की शक्ल देखो हजारों मजदूर मजबूर हो धरने पर बैठ गए है,इतना ही तो मांग रहे हैं कि जाने दो साहब हमें घर जाने दो ,घर में मां बाबू पत्नी बच्चे बेबस,बेआश रो रहे हैं, मजदूर चीख रहे है घर जाने की भीख मांग रहे है,कौन सुन रहा है? मुंबई के बांद्रा में किसी ने कह दिया घर जाने के लिए गरीब को आजादी मिल गई है,घर जाएंगे अपनों से मिलेंगे दिल की बताएंगे उनकी सुनेंगे हजारों सपने खुली आंखों में खिलखिला उठे गरीब मजदूर उठ खड़ा हुआ, सारा सामान समेट निकल पड़ा और स्वागत में पुलिसिया लाठी उसकी बाट निहार रही होगी उसे एहसास ना था उसे आश थी कि वह अपने गांव जाएगा । दिल्ली का आनंद विहार तो सिरो की सुनामी ले आया, हर दिल में बस गांव जाने की उमंग, जिंदगी का तो पता नहीं पर जितनी भी बची है अपनों के बीच बीते इतना भी हक मजबूर मजदूर के हिस्से नहीं दे पाए हम..ये दिल्ली तेरे दिल से निकल गरीब चला तेरी शानो शौकत सब अमीरो के लिए है। ऐसा लगा हर गरीब के बन्द लब यही बोलने को उतारू है। दिल्ली का मोह मानो मजदूर की आंखों से भंग हो गया हो, इस बेबसी पर वो आंखें मूंदे बैठे हैं जिनके लिए कतार में खड़े हो मजदूर ने अपनी तकदीर लिख दी,उन्हीं हुक्मरानों ने मजदूर के पांव मजबूरी की बेड़ियों से जकड़ दिया । सच ही तो है “आखिर मौत गरीब के हिस्से ही आएगी,बाहर करोना घर में भूख निकल जाएगी”।
लॉक डाउन शुरू होने से पहले कौन सा खाका तैयार किया गया? प्रवासियों पर पड़ने वाले इस अंजाने प्रहार से बचाने का किस ने मंथन किया? किसने सोचा अपनों से कोसों दूर एक छोटे कमरे में चार पांच छह लोग कैसे घुटते, सिंमटे,जकड़े बैठे रहेंगे? जब बाहर निकलने की भी मनाही हो जाएगी। जिन मजदूरों ने इस नाराकीय बेदना के जख्म को सहा है वह जब और न सह सके तो उठ खड़े हुए, कदमों से भारत को नापने का हौसला ले, साहस संयम की पराकाष्ठा इन गरीबों को अपने ही धरती पर अपने ही पांव से चलने भी ना दिया गया, किसी को नहीं मालूम क्यों? वो बीमार भी है या नहीं, उन्हें करोना नामक बीमारी है भी है या नहीं ना कोई जाँच न पड़ताल न उपचार न परिणाम बस रात के आठ बजे वाले हुक्म पर सबकी किस्मत पर तालाबन्दी, कोई रोये तड़पे पुकारे चिल्लाये सब बेकार हुक्म सरकार का चलेगा बस,नतीजा लाकडाउन की जंजीरो ने गरीब को जकड लिया। वेदना महसूस कीजिये “बिखरी पड़ी है मजबूरी की तश्वीरे चारो ओर, इंसानियत का चेहरा अब तक नही दिखा”।।
गरीब ने ना साधन मांगा ना सवारी न टिकट न किराया न सुरक्षा न राशन न भोजन उसने तो बस रस्ता मांगा और रास्ता भी ना दे पाया हिंदुस्तान, अपने खून पसीने से वतन को हिंदुस्तान को बनाने, चमकाने,सजाने वाले मजदूर को हम इस बात को भुला नहीं पाएंगे। हम इन डबडबाई आंखों, सहमी सांसों, लरजती जुबा से गांव जाने की फरियाद करते बेबस गरीब मजदूर मजबूर की दास्तां इस सच्ची दस्ता को। अपना गांव अपना घर उनके जेहन में इस कदर जम गया है कि बहुत से अब शहर की ओर शायद ही रुख करने की हिमाकत भी कर पाएं,काश नेताओं के दिल में गरीब का भी दर्द होता बातों के बतासे बांटते वक़्त गरीबी का चर्चा कर रोने वाले काश गरीब के पांव के छालों को भी देख छलक जाते, पर हकीकत और कहानी का यही फर्क होता है। सड़क पर चलते कितने कुचल दिए गए, कितनी बेटियों बहनों की आबरू दांव पर लग गई, कितने घर से लेकर टेंट, तंबू, शेल्टर, बसेरा में सिमटे,ठिठके बैठे हैं, सांसो को कोसते सांसे ले रहे हैं..हर सांस पर यही सवाल आखिर हमारा कसूर गरीबी के अलावा है क्या? हमारी मदद कौन करेगा? हम अपने गांव जा भी पाएंगे या नहीं,अपनों से मिल भी पाएंगे कभी यह नहीं? दर्द इससे ज्यादा क्या होगा “जिंदा रहने की जिद में जिंदगी का बोझ उठाए चल पड़े हैं, मौत के खौफ में ये गुरबत के सताएं”।
यह तालाबंदी वाकई गरीबों के लिए सबक भी है मजदूर को नसीहत भी है कि तुम सिर्फ भीड़ हो और भीड़ की न शक्ल होती है न भीड़ का कोई दर्द न भीड़ का कोई जख्म न ख्वाब न ही भीड़ का कोई नेता नायक ही होता है, कही तुम भीड़ बन रैलियों की खूबसूरती हो तो कही लंबी कतारों की शान कभी कारखानों का पसीना बन बह रहे हो तो कभी इमारतों की ऊंचाई कभी सड़कों पर परेशान वो भीड तुम ही हो,देखो गौर से और पूछो खुद से कब तक बने रहोगे भीड़।मन की बात वायदो की बारात तो है पर आफत मे राहत कहा है? यह देख लो समझ लो और फिर कभी जब रहम, अपनापन, तुम्हारे हक की बात कह कर कोई हाथ बढ़ा तुम्हारा साथ मांगने आये तो उनसे पूछना साहेब तब कहा थे जब हाथ जोड़ कर चिल्ला चिल्ला कर तुम्हे मजदूर बुला रहे थे,ये किस बात की सज़ा दी मजदूर को पूछना जरूर, ये लाक डाउन की बेड़ियाँ याद रखना, याद रखना अपने ही देश मे कैद रहने के येअच्छे दिन।
आज मजदूर दिवस पर देश भर मे लगभग चार करोड़ मजदूर की आठ करोड़ आँखो के सपनो पर ग्रहण लगा है, हाथों मे रोजगार नही जेब मे रुपया नही घर जाने को राह नही गरीब का भी जमीर होता है उसे खैरात की रोटी नही अपनो की खैरियत अपनो का साथ चाहिए। मजदूर इस कैद की रोटी से ऊब चुका है, आपकी तानाशाही, नासमझी, नाउम्मीदी देख मजबूर मजदूर थक चुका है,उठो मेहनतकाशो एक साथ एक आवाज़ मे बोलो वक़्त है ये “जंजीरे तुम्हारे हाथो की बातो से न टूटेंगी, अब लब की आवाज को हथियार बनाना होगा”।

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