घुंघरू में लिपटी पाज़ेब

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घुंघरू में लिपटी पाज़ेब

  • फौज़िया अफ़ज़ाल ( फ़िज़ा )

वो मुझे देखकर मुस्कुराई , शायद एक दोस्ती की इल्तज़ा थी।जवाब मैने भी मुस्कुराहट से दिया।
बस यही हमारी मुलाक़ात थी जो रोज़ कॉलेज में होती थी।
मै रोज़ देखती वो सबसे अलग पढ़ती रहती।
एक जुनून था उसके वजूद में , कुछ नया पाने का जुनून , सब कुछ सीखने की चाह , हर प्रोफेसर को नाज था उसकी हाज़िर जवाबी , उनकी अवलमंदी पर, हर गीत संगीत प्रतियोगिता हो या कोई वाद विवाद , उसका नाम हमेशा सुनाई देता।
पर मैने एक बात देखी वो किसी से ना बोलती थी ना कोई उससे बोलता था, बस उसको देख के सबके चेहरे पे दस रंग दिखाई ज़रूर देते थे।

खैर मुझे इस बात से कोई खास मतलब नहीं था , बस मैने सोचा आज उसकी मुस्कुराहट का जवाब हाथ मिलाकर दूंगी,,,,
वो मुस्कुराई और मै उसकी तरफ बढ़ी, उसने भी मुझ से हाथ मिलाया, हम दोनों थोड़ी देर अपने बारे में बात करते रहे , उसने बताया वो अनाथ है, पर उनकी एक आंटी है उन्होंने उसे कचरे से उठाया पाला पोसा , उसको पढ़ने का शौक था , पर उसका एडमिशन किसी भी स्कूल में नहीं हो पाया तो उसने अपनी पढ़ाई घर से ही शुरू की, एक अच्छी टीचर मिली तो उन्होंने 10 की परीक्षा दिलवाई , जब उसके टॉप करने की खबर अखबार में छपी तो उसका एडमिशन हो पाया, घर पर ही उसको गीत संगीत चित्रकारी की शिक्षा दी जाती है।

वो मुझे बताती जा रही थी , और मुझे लग रहा था कि कुछ छूट रहा था, यह बहुत खूबसूरती से कुछ बाते छिपा रही है।
पर वो अकेली थी और एक हुनरमंद और अकलमंद लड़की थी जो मेरे लिए काफी था। पर जब भी मेरी उससे फोन पर बात होती पीछे से गाने की आवाज़ आती वो यह कहकर टाल जाती की शाम को उसकी क्लास होती हैं तो वो बात नहीं कर सकती।

मैने भी सोचा अच्छा है कितना ख्याल रखती है इसकी आंटी ………..

वक़्त गुज़र रहा था , मैने उसके साथ रहते रहते एक बात देखी की जो भी हमे साथ देखता , मुझे उनकी नज़रों में शक नजर आता, चेहरे के रंग देख देखकर मैं परेशान हो गई थी , जिससे भी बात करने की कोशिश करती वो चला जाता,
दिल और दिमाग़ में हलचल हो रही थी।
सवाल तो थे पर जवाब कोई नहीं था।
इसी तरह दिन बीत रहे थे,,,

एक दिन वो बोली तुम मेरे घर चलोगी? मिलोगी मेरी आंटी से?
मैने कहा ज़रूर आज शाम को चलते है।
शाम हुई जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था , घर में मैने अपनी अम्मी को बताया और निकल गई,
एक चौराहे पे वो मुझे मिली वहा से हम लोग पैदल चलने लगे।अचानक मैने देखा एक खूबसूरत बाज़ार यहां तो मैं कभी नहीं आईं , शायद ही गुजरी हूं इस चौराहे से।

अपनी आदत के मुताबिक मैने उससे सवाल नहीं किया , अब गानों, तबलों, घुंघरू की आवाज़ें मेरे कानो में तेज़ होने लगी।
एक बार मेरे कदम रुके , लगा अब नहीं चल पाऊंगी , कपकपाहट सी होने लगी जिस्म में….
उसने पलट के मुझे देखा ….
जैसे कह रही हो , बस देख ली मेरी सच्चाई , आ गई अपनी शराफत याद , जा सकती हो तुम , मिल गए सारे सवालों के जवाब तुमको? या कुछ बाकी है?

मैने फौरन खुद पर काबू किया और हल्की सी मुस्कुरहट के साथ उसका हाथ पकड़ कर उसके साथ आगे बढ़ गई।

बड़ा सा दरवाज़ा , उसमे एक बड़ा सा आंगन , चारो तरफ खूबसूरत गमले, बीच में रंग बिरंगे पानी का फव्वारा, चारो तरह सफेद रंग से लिपटी दीवारें, हरियाली के बीच गुलाब के फ़ूल,अंदर से आती हुई धीमी धीमी महक, संगीत की आवाज़, काफी था मुझे अंदर जाकर देखने को मजबूर करने के लिए।

धीरे धीरे आती घुंघरुओं की आवाज़ अब तेज़ होने लगी थी, कितनी दिलकश मधुर आवाज़ थी । तबले की ताल से मेल खाते सुर ताल मदहोश कर रहे थे। अनायास मेरे कदम तेज़ तेज़ बढ़ने लगे।

हम दोनों दाखिल हुए एक बड़े हॉल में, वहां की खूबसूरती सुर्ख और सफेद रंग से कहर ढा रही थी। वहां की रौनक देखने लायक थी।

सुर्ख फर वाले कालीन पर बैठते ही उसकी आंटी आ गई,आंटी मुझे देखकर खुश हुई , वो खुश थी हम दोनों की दोस्ती से….
थोड़ी देर में वो बोली , चलो अब तुम्हे देर हो जाएगी । मै तुमको चौराहे तक छोड़ दूं।

बाहर आते ही वो बोली शायद यह हम दोनों की आखिरी मुलाक़ात हो।मैने तुमको अपना सच दिखाया, अब कभी इधर से ना गुजरना।

मै चुप रही , घर तक आते आते दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था । सोचा अम्मी को बताऊं, पर क्या बताऊं ?

दिमाग़ बहुत परेशान था , नींद आ ही नहीं रही थी , ना पढ़ पा रही थी , ना ही कोई लेख लिख पा रही थी , ना ही भूख लग रही थी।

अम्मी आईं बोली,” बेटा आज जब से तुम आईं हो काफी परेशान हो,?
मां अपने बच्चो की हर परेशानी को समझ जाती है, बताओ क्या बात है?

मैने एक लम्बी सांस भरी सोचा एक सांस में बोल दूं पर हलक से ना आवाज़ बाहर आ रही थी। ना ही शब्द इकठ्ठा हो कर शुरुवात हो पा रही थी, लग रहा था मैं लफ्जो को जोड़ रही हूं, और कोई शब्द बन नहीं पा रहे।

मैने हिम्मत की… सारी बात अम्मी को बताई, अम्मी सुन ज़रूर रही थी पर सोच कुछ और रही थी।

बहुत देर कमरे में सन्नाटा रहा, मै तो मुजरिम की तरह बैठी थी।
कि अब बस मुझे एक दोस्त खोनी पड़ेगी। मेरी दोस्त जिसकी उड़ान यही नहीं है, उसका सपना था शितिज तक उड़ान का, जिसमें ना धरती की सीमा होती ना आकाश की , लगता तो ही की वो दूर आखिरी छोर है पर वो आखिर कभी नहीं होता…

वैश्या चरित्रहीन नहीं होती , वो भी अपने काम की मर्यादा में रहकर वफादारी के साथ अपने काम करती है”।

चरित्र हीन तो वो लोग है जो खुद अपने किरदार की मर्यादा के साथ वफादारी नहीं कर सकते।”

यह अम्मी की पहली आवाज़ थी , जो उस सन्नाटे के बाद मेरे कानो में पड़ी।

वो बच्ची ऐसी जगह रहकर भी अपने किरदार अपने जज्बात , अपने अखलाक को संवार रही है,
उन लाखों ,करोड़ों लोगों से खास है वो , जो सब कुछ हासिल होते हुए भी, अच्छे परिवार में परवरिश लेके भी, एक शरीफ और नेक समाज का हिस्सा होते हुए भी, ना आज तक अपना अखलाक संवार पाए ना अपना किरदार बना पाए……

हमेशा बढ़ावा देते है गलत बातों, गलत आदतों को,
यह मासूम तो शिकार है हम जैसे गलत लोगो की दिखावे की शराफत और झुटी शान का…

वहीं पाज़ेब तुमने पहनी वहीं पाज़ेब उसने पहनी , घुंघरुओं को तो नहीं पता उनको कितना बजना है? कहां बजना हैं? किसके पैर में बजना हैं…?

उनकी तो फितरत है बजना

तय तो हम लोग करते है हमारी नियत किसके लिए कैसी है।

यह हमारी बेटी के पैर में बज रहे हैं या किसी वैश्या के………!
इस लड़की में तुमको क्या कमी लगती है यही ना कि सिर्फ वो ऐसी जगह रहती है…

पर बेटा यह सोचो ऐसी जगह का उसके किरदार पर कोई असर नहीं हुआ…….

वोतो एक कमल है, चंदन के पेड़ पर भी सांप लिपटे रहते है पर क्या वो ज़हरीला होता है?

” नहीं बेटा कभी नहीं। और सबसे बड़ी शाबाशी का काम तो उसकी आंटी का है … जिन्होंने एक कचरे से उठाई हुई बच्ची को तालीम दिलाई , हुनरमंद बनाया।

तो मेरी नज़रों में तो वो बहुत इज्ज़त के लायक है…

रही उनके काम की बात , वो उनका काम है , हर इंसान का अपना काम है , पर हर काम की एक मर्यादा होती है अगर वो खुद के लिए खुद की खुशी के लिए , खुद ही किया जाए। हर इंसान अपनी निजी जिंदगी को जीने का हक रखता है।

जो चीज हमारी नज़रों में गलत है , वो दूसरे के लिए सही हो सकती है … जो हम कर रहे बहुत लोग उसको भी नापसंद करते है , पर हम फिर भी करते है… क्योंकि अपने फायदे नुकसान हम खुद बेहतर जानते हैं। “
वो उन सबसे सच्ची है , जो भी करती है खुल के बता के , अपने काम से वफादारी के साथ करती है।

मै तो गुनहगार मानती हूं उन मां बाप को जो उसको फेंक गए। बदकिस्मत थे , जो खुदा की दी हुई नेमत को फेंक दिया इसका हिसाब खुदा उनसे लेगा ।

और जो आज उस बच्ची के लिए वो आंटी कर रही हैं खुदा उसको भी देख रहा है। जब खुदा अपने बंदों कि अच्छाई, बुराई, सही गलत देखने वाला है , कब किसको कहां बख्श दे, तो हम कौन होते है हिसाब किताब वाले,,,,,,
यह नेक काम भी उपर वाला उनसे करा रहा है…..

और बेटा जब उस माहौल में आज वो बच्ची ओरो से अच्छी परवरिश पा रही है तो तुम कैसे बिगड़ सकती हो।

मुझे भी यकीन है अपनी परवरिश पर।
तुम सिर्फ एक लड़की के हौसलों की उड़ान में उसके साथ खड़ी हो। तुम दोनों अब अपने इम्तहान की तय्यारी करो,,,,,,,

सोचने का काम उन पर छोड़ दो , जो आज तक कुछ ना कर पाए , ना कभी कर पाएंगे , क्युकी उनकी मानसिकता और सोच का कोई इलाज ही नहीं है। तुम बस खुद को साबित करो… जैसे आज तक तुम्हारी दोस्त करती आईं है”…..!

मै अवाक बनी बस सुन रही थी , मुझे अपने सवालों के जवाब मिल गए थे।

अगले दिन कॉलेज में मैने उसको देखा , पर वो मुस्कुराई नहीं …..!
मै उसके पास गई , बोली,” परसो छुट्टी है , पढ़ाई के लिए घर आ जाना , अम्मी ने बुलाया है, तुम्हारे घर चलती , पर वहां शोर बहुत होता है”।

इतना सुनते ही वो और मैं ज़ोर से खिलखिलाकर हंस पड़े।
वो मेरे गले लगी थी, और अम्मी की बातें मेरे कानों में गूंज रही थी ।

मुझे पता था अम्मी अगर मुझे मना करती , तो मुझे बुरा लगता हम दोनों की दोस्ती खतम हो जाती , पर कॉलेज में तो हम मिलते ही, जहां अम्मी ना होती …!
अम्मी ने रास्ता बनाया की हम जायदा वक़्त अम्मी के साथ घर पे बिताए, अम्मी की नज़रों के सामने ……।

शायद अम्मी समझ चुकी थी कि यह घुंघरू में लिपटी हुई एक बेटी की पाज़ेब है।

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